Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
मैनाकमुग्धपीनस्य सागरस्यावनिं प्रति ।
सन्ति सर्गसहस्राणि स्थाणुभूतान्यथो मया ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चाँदी की शिला के अन्दर अनन्त जगत् विद्यमान हैं; कैसे ही समुद्र के पेट में जितने प्रदेश
पड़े हैं; उनमें भी अनेक जगत् विद्यमान हैं; उनका भी मैने अनुभव किया, यह कहते हैं /
तदनन्तर मैनाक पर्वत के सदृश भीतर छिपी हुई पर्वतशिलाओं से मनोहर तथा असीम
विस्तारवाले समुद्र के पेट में स्थित प्रत्येक प्रदेश के अन्दर हजारों स्थाणुरूप जो सृष्टियाँ विद्यमान
हैं, उनका भी मैंने अनुभव किया