Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
स्वमेवाहमभूवं भूमण्डलं द्वीपकुण्डलम् ।
सर्वात्मनापि न व्याप्तं किंचनापि मया क्वचित् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
मेँ आध्यासिक
आत्मा का ही स्वरूपभूत भूमण्डल तथा द्वीपकुण्डलरूप बन गया था । यों सर्वात्मक होते हुए भी
मैंने परमार्थरूप से कहीं किसी का भी स्पर्श नहीं किया, क्योकि परमार्थ दशा में मैं असंग अद्बयरूप
ही हूँ