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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

तदिहास्तमहं यामि स्वं लोकमिति निश्चयम् । यावद्गन्तुं प्रवृत्तोऽस्मि तावत्संकल्पनक्षयात् ॥ १३ ॥ सा निवृत्ता कुटी तत्र संपन्नं व्योम केवलम् । स सिद्धोऽपि निराधारः पतितोधः समाधिमान् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अब मेरा वह शरीर तो नष्ट हो गया, अतः मैंने यह निश्चय किया कि इस आतिवाहिक देह से ही मैं अपने सप्तर्षिलोक को जाऊ, यों निश्चयकर ज्यों ही मैं जाने के लिए उद्यत हुआ, त्यों ही मेरे पूर्वसंकल्प के नष्ट हो जाने से वह कुटिया भी अदृश्य हो गई ओर वहाँ केवल शुद्ध आकाशमण्डल ही रह गया । वह सिद्ध भी समाधि अवस्था में ही निराधार होकर नीचे की ओर गिरने लग गये