Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verses 15–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसंकल्पसंशान्तौ स्वप्नसंकल्पपत्तनम् ।
यदा सा सुकुटी नष्टा मत्संकल्पोपशान्तितः ॥ १५ ॥
स पपात ततो ध्यानी जलोत्पीड इवाम्बुदात् ।
खादिवानिलनुन्नोऽब्द इन्दुबिम्बमिव क्षये ॥ १६ ॥
वैमानिक इवापुण्यश्छिन्नमूल इव द्रुमः ।
खात्त्यक्त इव पाषाणः स पपात ततोऽवनौ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न संकल्प की शान्ति हो जाने पर जैसे
स्वप्न का नगर ध्वस्त हो जाता है, वैसे ही मेरे संकल्प की शान्ति हो जाने से जब वह कुटिया नष्ट
हो गई, तब मेघ से जलसमूह के सदुश वहाँ से वह गिरने लगे उस समय वह ऐसे प्रतीत हो रहे थे,
मानों वायु से छिन्न किया गया मेघखण्ड आकाश से गिर रहा हो या प्रलय काल में चन्द्रबिम्ब
आकाश से गिर रहा हो या पुण्य का क्षय हो जाने पर वैमानिक गिर रहा हो या मूल के कट जाने पर
वृक्ष गिर रहा हो या आकाश से फेंका गया पत्थर गिर रहा हो । वे आगे कही जानेवाली कांचन भूमि
के ऊपर गिरे