Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धमात्रादृते परम् ।
नेह किंचन नामास्ति किमेतावत्यहं रमे ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अपरिच्छिन्न चुखको छोड़कर परिगणित फरिच्छिन्न अछुख में रमण करना उचित नहीं है, यह
कहते हैं /
इस संसार में शब्द, रूप, रस, स्पर्श ओर गन्ध मात्र को छोड़कर दूसरी कोई वस्तु है ही
नहीं, इसलिए ऐसे तुच्छ पदार्थों में क्यों रमूँ ?