Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रैकसारेषु रम्यं भोगेषु नाम किम् ।
अवतिष्ठे गतोद्वेगसंविद्व्योम्न्येव केवलम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
सिद्ध ने जो विचार किया, उसे कहते हैं /
जिनका सार केवल ज्ञान (संवित्) ही है, उन भोगों में रम्य वस्तु है ही कौन ? यदि उनमें
संविद्रप से प्रकाशमान सुख ही रम्य वस्तु है, तो सुख से भिन्न सुखसाधन दुःखरूप होने से उनका
सार दुःख ही ठहरा, इसलिए दुःखांश को छोडकर सारभूत सुख संविदाकाश में ही केवल अवस्थित
रहूँ, दूसरे समस्त असार से अब मतलब ही क्या ?