Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
कायोऽयमचिरापायो बुद्बुदोऽम्बुनिधाविव ।
स्फुरन्नेव पुरोन्तर्द्धि याति दीपशिखा यथा ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह शरीर-समुद्र
में बुलबुले के सदृश जल्दी ही नष्ट हो जानेवाला पदार्थ है, इसलिए कुछ काल तक स्फुरित होते ही
सामने देखते-देखते, दीपशिखा के सदृश, विलीन हो जाता है