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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

जीर्णा जीवितजम्बालजरच्छफरिकामतिः । कायं द्रुतगताऽऽदातुं जरेच्छति बृहद्वकी ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

किसी तरह शरीर में भी आसकित उचित नहीं है, यह कहते हैं / जल्दी प्राप्त होनेवाला बुढ़ापा एक तरह की बड़ी बकी (बगुली) है, यह जब जीवन जीर्णं होने लगता है, तब सोचती है कि मैंने इस जीर्ण जीवनरूपी शैवाल में बड़ी मछली पकड़ ली । यों बुद्धि करके वह तत्काल ही शरीर को अपने उदरस्थ कर लेने की इच्छा करती है