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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्ता ये निवर्तन्ते तैरलं हतभावकैः । अपूर्वा ये प्रवर्तन्ते तेष्वथास्थेह कीदृशी ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस स्थिति में जो जानेवाले ढै ओर जो आनेवाले हैं; उनके विषय में हर्ष-शोक करना उचित नहीं है, यह कहते हैं । जो पहले प्राप्त हुए हैं, वे तो निवृत्त हो जाते हैं और कभी प्राप्त हुए ही नहीं वे प्राप्त होते हैं, इसलिए ऐसे नष्ट स्थितिवाले पदार्थों की प्राप्ति से क्या ओर इनमें आस्था करना ही क्या ? यानी न तो उनसे कोई मतलब निकलेगा और न वे विश्वास करने योग्य ही हैं