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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

भुक्तानि भोगवृन्दानि दृष्टा चानित्यता भृशम् । नोपलभ्यत एवाति विश्रान्तिरिह कुत्रचित् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि अनेक तरह के अनेक भोग भोगे, बार-बार पदार्थों की अस्थायिता भी देख ली, परन्तु कहींपर भी यहाँ उत्तम शान्ति प्राप्त नहीं की जा सकी