Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तमुत्तुङ्गशृङ्गासु मेरूपवनभूमिषु ।
लोकपालपुरीषूच्चैः संप्राप्तं किमकृत्रिमम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मैंने उत्तुंग शिखरोवाले मेरूपर्वत की उपवन
भूमियों मेँ खूब विहार किया तथा लोकपालों की महान् नगरियों मे भी खूब विहार किया, तथापि
क्या आज तक मेने स्वाभाविक (अकृत्रित) सुख पाया ? अर्थात् नहीं ही पाया