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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

सर्वत्र दारुभिर्वृक्षा मांसैर्भूतानि भूर्मृदा । दुःखान्यनित्यता चेति कथमाश्वास्यते वद ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

अब सक भोगो की असारता विवेकपूर्वक बतलाते हैं सभी जगह के वृक्ष काष्ठं से ही व्याप्त हैं, प्राणिसमूह मांस से व्याप्त है, पृथ्वी मिट्टी से भरी पडी है, और दुःख एवं नश्वरता सारे संसार को घेर कर खडी है, फिर आप किये कि उनमें विश्वास कैसे हो