Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
न धनानि न मित्राणि न सुखानि न बान्धवाः ।
शक्नुवन्ति परित्रातुं कालेनाकलितं जनम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
न तो धन, न मित्र, न सुख ओर बान्धव ही उस पुरुष की रक्षा
कर सकते हैं, जो कि काल के गाल में फस चुका है