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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

जनो जीमूतजठरजलवद्गिरिकुक्षिषु । यात्यन्तःशून्य एवास्तं पांसूपचयपेलवः ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

बालू के ढेर के सदृश यह पुरुष अत्यन्त अस्थिर है, पर्वतो के मध्य में बरसे हुए मेघ के पेट में विद्यमान जल जैसे क्षण क्षण में नष्ट होता रहता है, भीतर से बचाव का उपाय नहीं करता और आखिर में नष्ट हो जाता है ठीक वैसे ही वह पुरुष विषयों के अन्दर आसक्त होकर क्षण क्षण में विनाश की ओर जाता रहता है ओर अन्त में मरण ही प्राप्त करता हे