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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

विवेकामोदसर्वस्वं चेतः कुसुमकोशतः । हृत्वा मूर्च्छां प्रयच्छन्ति विषया विषवायवः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योंकि ऐहिक और आमुष्मिक (पारलॉकिक) विषय कारमियों को ही विवेक से श्रहठ कर अनर्थ की ओर पहुँचाते हैं; यह कहते हैं । विषयरूप विषपूर्ण वायुमण्डल अन्तःकरणरूपी फूल के कोश से विवेक सुगन्धरूपी सर्वस्वका अपहरण कर कर्मशास्त्र में प्रवृत्त पुरुष को मूर्च्छा प्रदान करता है