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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

विधिभिः प्रतिषेधैश्च शाश्वतैरप्यशाश्वतैः । यथेष्टं नीयते लोको जलं निमनोन्नतैरिव ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

विवेकी को तो कर्मधा भी व्यामोहकारक ही दीखते हैं; यह कहते हैं। निरन्तर के लिए विधि-प्रतिषेध के प्रतिपादक कर्मशास्त्र हों, चाहे कभी कभी के लिए विधि- निषेध के प्रतिपादक कर्मशास्त्र हों, इनसे तो पुरुष लोक में उस प्रकार यथेष्ट लुढ़कता फिरता है, जैसे निम्न और उन्नत स्थानों से जल