Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
आपदापतितैवेयमहो मोहविधायिनी ।
नित्यमित्येव मन्तव्यं सक्तव्यं नेह संसृतौ ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकी पुरुषों को सम्पत्ति आदि की प्राप्ति में भी निरन्तर यही मानना चाहिए कि यह
बड़ी भारी आपत्ति ही आई, क्योकि वही विषयसम्पत्ति पुरुष में बड़ा भारी मोह पैदा करती है,
इसलिए इस तुच्छ संसार में तो कभी आस्था बोधनी ही नहीं चाहिए