Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
द्वन्द्वदोषोपरुद्धानि दुःसाध्यान्यस्थिराणि च ।
धनान्यभव्यसेव्यानि मम जातु न तुष्टये ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके उपायथूत धन में दोष बतलाते हैं /
धन इन्द्रों से आक्रान्त हैं यानी उनका उपार्जन करने के समय शीतोष्ण, क्षुधा-पिपासा
आदि दन्दो का सामना करना ही पड़ता है । अतः वे कष्टसाध्य हैं, और वे स्थिर भी नहीं
हैँ, क्योकि राजा, चोर आदि से उनका विनाश पद-पद में संभावित है