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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

द्वयोस्तु सिद्धयोः सिद्धविरुद्धेप्सितयोर्मिथः । अधिकैकावदातात्मा जयी पुरुषयत्नवान् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ दो प्रिद्ध परस्परविरुद्ध स्रकल्प करें- जैसे एक तो यह संकल्य करे कि में” इसे देखूँ और दूसरा यह कल्प करे कि मुझे यह न देखे” ऐसी स्थिति में वहाँ केंसी व्यवस्था होगी 2 इस आशंका पर कहते हैं । परस्पर सिद्ध एवं विरुद्ध अभिष्टवाले दो सिद्धों में जो अधिक निर्मलात्मा यत्नवान्‌ रहता है वह बाजी मार ले जाता है । जैसे एक राज्यसिद्धि के लिए प्रयत्न कर रहे दो राजकुमारों में जिसमें शौर्य आदि अधिक मात्रा में रहते हैं, उसी की विजय होती है वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये