Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 24–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
भ्रमतः सिद्धसेनासु लोकपालपुरीषु मे ।
विस्मृता व्यवहारौघैः सातिवाहिकतात्मनः ॥ २४ ॥
यदा तदाहमपरैर्व्यवहर्तुं महाम्बरे ।
प्रवृत्तो न च मां कश्चित्तत्र पश्यति चञ्चलम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा ही सही, परन्तु आपके इस कथन से ग्रकृत में क्या आया, इसपर कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, सिद्धों की सेनाओं तथा लोकपालों की पुरियों मेँ विचरण करते हुए मेरी वह
सूक्ष्मरूपता व्यवहारो की अधिकता से जब विस्मृत हो गई-जब मैं अपना सूक्ष्म स्वरूप भूल गया
तब महाकाश में अन्य लोगों के साथ व्यवहार करने में प्रवृत्त हो गया, परन्तु मेरा ऐसा चंचल रूप था
कि वहाँ मुझे कोई नहीं देख पाता था