Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
श्वशृगालोपमाः केचिद्ग्रामजङ्गलवासिनः ।
कुल्यावकररथ्यासु वसन्ति निरयेषु च ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इनमें
कुछ ऐसे होते हैं जिनकी उपमा कुत्तों तथा सियारों से दी जा सकती है । कोई ऐसे होते हैं, जो गाँवों
में तथा जंगलों में निवास करते हैं तथा कोई ऐसे भी होते हैं जिनका नहरों, कुओं, मार्गों एवं
नरकसदृश अपवित्र देशों में ही सदा वास रहता है