Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 43–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

अचेत्यचिन्मयं ब्रह्म सर्वशक्तिस्वभावतः । यत्स्थितं बुद्धमेवान्तश्चेत्यं संकल्पयन्निव ॥ ४३ ॥ तं जीवं विद्धि स प्रौढस्त्वहंकार इति स्मृतः । सोऽहंकारः स्मृतः पुष्टो मन इत्युदितात्मभिः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, कार्यब्रह्म से विलक्षण जो मायाशबल ब्रह्म है, वह समस्त शक्तियों के स्वभाव से विषय का संकल्प करते हुए मनोमय पुरुष के समान भीतर अवबुद्ध होकर स्वरूप से जो स्थित है उसी को जीव नामक प्रथम अंकुर समझिये । अभिमान से परिपूर्ण वही अहंकार कहा गया है तथा परिपुष्ट हुए उस अहंकार को ही जिन्हें आत्मा का आविर्भाव हो गया है उन महानुभावों ने, मन कहा है