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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

वस्तुतोऽङ्ग न सर्गादिर्न सर्गो नाप्यसर्गता । विद्यते सकृदाभातमिदमित्थं सदैव तत् ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, वस्तुतः न तो सृष्टि का कोई कारण है, न सर्गता है ओर न असर्गता ही है, किन्तु सिर्फ एक बार अवभासित हुआ पुनः आवरण होने के कारण प्रपंचरूप से प्रसिद्धि को प्राप्त यह प्रत्यक्रूप ब्रह्म ही सर्वदा विद्यमान है