Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 80
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 80 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 80
संस्कृत श्लोक
यथा यत्रेह वै निम्ना जलं तत्रावतिष्ठते ।
तथा यत्र पिशाचाद्यास्तमस्तत्रावतिष्ठते ॥ ८० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे ऊँच-नीच जमीन के तारतम्य में जलकी (स्थिति में तारतम्य रहता है वैसे ही पाप के
तारतम्य से उनमें तमोगुण का तारतम्य स्थित रहता हैं, यह कहते हैं /
जैसे इस संसार में गहरी जमीन में जल स्थित रहता है वैसे ही जहाँ पिशाच आदि रहते हैं वहाँ
पर उनके पाप के तारतम्य से थोड़ा-बहुत तमोगुण भी स्थित रहता है