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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । आ स्मृतं श्रृणु वृत्तान्तं ततो मम जगद्गृहे । भ्रमतः सिद्धसेनासु लोकपालपुरीषु च ॥ ९ ॥ अहमिन्द्रपुरं प्राप्तो न कश्चित्तत्र दृष्टवान् । मामिमं देहरहितमातिवाहिकदेहिनम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, हाँ, मुझे स्मरण हो आया, सुनिये उसके बाद की मेरी आत्म कहानी । सुवर्णमयी भूमि से चलकर जगत्रूपी घर में सिद्धो की सेनाओं तथा लोकपालों की पुरिया में भ्रमण करता हुआ मैं इन्द्र भगवान्‌ के नगर में पहुँचा । चूँकि मैं इस स्थूल शरीर से रहित मनोमात्र शरीरधारी था, अतः वहाँ मुझको कोई देख न सका