Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततश्चिदाकाशवपुर्भूतपञ्चकवर्जितः ।
विहरन्नहमाकाशे पिशाच इव संस्थितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उस समय पंचभूतों से रहित केवल
चिदाकाश मात्र शरीरधारी मैं पिशाच के सदृश आकाश में विहार करता हुआ स्थित था
सर्ग सन्दर्भ
चौरानबेवाँ सर्ग समाप्त पंचानबेवाँ सर्ग सत्यसंकल्पता की स्मृति से पुनः प्राणियों के साथ व्यवहार तथा अपने आकाशवसिष्ठ आदि नामों की प्राप्ति का वर्णन।