Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
ततःप्रभृति लोकेऽहं पार्थिवः प्रथितः क्वचित् ।
अम्मयः क्वचिदन्येषां तैजसो मारुतः क्वचित् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तभी से मैं लोकों में कहीं पार्थिव, कहीं
जलमय, कहीं तैजस और कहींपर मारुत-वसिष्ठ नाम से अन्यान्य लोगों द्वारा प्रसिद्ध हुआ