Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जीवन्मुक्तो व्यवहरंस्तथास्ते ब्रह्मखात्मकः ।
तथैवादेहमुक्तोऽपि तिष्ठति ब्रह्ममात्रकः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
वस्ुतः सदेह और विदेह गुक््त- ये दोनों एक ही रूप के हैं; यह कहते हैं /
जैसे जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी पुरुष व्यवहार करता हुआ ब्रह्माकाशरूप से स्थित रहता है वैसे ही
विदेहमुक्त भी ब्रह्माकाशरूप से ही अवस्थित रहता है