Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
मम न ब्रह्मतापेता तादृग्व्यवहृतेरपि ।
असंभवादन्यदृशो युष्मदादिष्वहं त्वहम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म से अन्य दृष्टि का संभव न होने
से वैसा व्यवहार करते रहने पर भी मेरी ब्रह्मता नष्ट नहीं हुई - ज्यों-की-त्यों स्थित रही । तथा
आप जैसे सज्जनों के बीच उपदेश देने के लिए मैं वसिष्ठदेह से स्थित हूँ