Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यथाऽज्ञस्य स्वप्ननरे निर्जन्मनि निराकृतौ ।
आधिभौतिकताबुद्धिस्तथा मे जगतोपि च ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब आपका यह कथन कैसे ठीक समझा जाय कि शून्य देह में आधिभोतिकता रूढ हुई. इस
शकरा पर कहते हैं /
निराकार तथा जन्मशून्य स्वप्न के मनुष्य में अज्ञानी को जैसे आधिभौतिकता बुद्धि होती है
वैसे ही मुझे तथा अन्य जगत् को भी होती है