Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चिदाकाशादृते देहान्योऽन्यत्सारमवाप्नुयात् ।
तस्मै तद्युज्यते वक्तुं सन्ति लोभादयस्त्विति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाकाश को छोड़कर दूसरे दूसरे तुच्छ स्थूल आदि देहो को जो पुरुष अलग से सत्यरूप आत्मा
समझकर देखता है, उसी मूढ के लिए यह कहना उचित है कि लोभ आदि अनर्थ हैं