Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अहं चिन्नभ एवेति सत्ये भावे स्थिरे सति ।
वज्रपातयुगान्ताग्निदाहाः पुष्पोत्करोपमाः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं चिदाकाशस्वरूप ही हूँ, इस प्रकार का परमार्थ
सत्यरूप भाव जब स्थिर हो जाता है, तब वज़पात और युगान्त के (प्रलयकाल के) अग्निदाह भी
फूलों की ठेरी से हो जाते हैं