Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अहं चेतनमाकाशो नाशो मे नोपपद्यते ।
चेतनेन जगत्पूर्णं केव संदेहितात्र वः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मेँ चेतनात्मक आकाश
हूँ, मेरे विनाश का कोई भी सटीक हेतु नहीं है, सारा जगत् चेतन -सत्ता से व्याप्त है । अतः तुम
लोगों को यहाँ जन्म-मरण आदि का संशय ही नहीं करना चाहिए