Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
चिच्चेतति यथा वा यत्तत्तथा साशु पश्यति ।
आबालमेषोऽनुभवो न क्वचित्सा च नश्यति ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अविनाशी चेतन के अनुसार ही सबको वस्तुओं का अनुभव होता हैं, उससे विरुद्ध ग्रकार से
नहीं; यह कहते हैं /
चितिरूप आत्मा जिस प्रकार से जिस वस्तु का भ्रान्ति से अनुभव करती है, उसको उस प्रकार
से तत्काल ही देख लेती है, यह बालक तक का अनुभव है, अतः चिति कहीं भी नष्ट नहीं
होती