Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
परिपश्यति संसारं परिपश्यति मुक्तताम् ।
सुखदुःखानि जानाति स्वरूपात्तन्न भिद्यते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति संसार देखती है, मुक्ति देखती है, और सुख भी जानती है, इतना होने पर भी
अपने स्वरूप से कालभेद, देशभेद या वस्तुभेद द्वारा भिन्न नहीं होती