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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्वयंभूत्वसमापत्तौ तथा दृश्यव्यवस्थितौ । स्वरूपमजहत्त्वेव चिदाकाशमजं स्थितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न आत्मा का विवर्त हैं, कैसे ही समस्त जगत्‌ ब्रह्मात्मा का विवर्त है, यह जानना चाहिए, यह कहते हैं। चिदाकाश ब्रह्म समष्टिजीव के रूप में चाहे सूक्ष्म उपाधि को प्राप्त करे चाहे स्थूल दृश्यरूप उपाधि को प्राप्त करे, दोनों में अपना निर्विकार स्वरूप त्यागे बिना ही स्थित है