Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म चिन्मात्रकं विद्धि तद्यथा स्वप्नदृष्टिषु ।
पुरं भवन्निजाद्रूपान्न कदाचन भिद्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् चैतन्यमात्र का विवर्त है, यह सवको अपने-अपने स्वप्न के अनुभव से सिद्ध है, यह
कहते हैं।
राघव, आप ब्रह्म को केवल चेतनरूप ही जान लीजिये । वह अपने असली स्वभाव से कभी भी
ऐसे ही च्युत नहीं होता जैसे कि आत्मा स्वप्न में नगररूप होता हुआ भी अपने स्वभाव से च्युत नहीं
होता, इससे विवर्त का लक्षण यही निकला कि स्वरूप से च्युत न हुए पदार्थ की अन्यरूप से प्रतीति
विवर्त है । यह लक्षण जगत् में प्रसिद्ध ही है