Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
न च स्थितं किंचनापि क्वचनापि कदाचन ।
स्थितं ब्रह्मघने ब्रह्म यथास्थितमखण्डितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, किसी भी काल में कहीं भी कुछ
भी वस्तु स्थित नहीं है, किन्तु अखण्ड यथास्थित ब्रह्म ही चैतन्यानन्दघनरूप स्वभाव में स्थित
है ओर कुछ नहीं हे