Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पाषाणाख्यानमेतत्ते कथितं कार्यकोविद ।
अनयेमाः स्फुरद्दृष्ट्या सृष्टयो नभसि स्थिताः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तार से वर्णित पाकणोपाख्यान को सर्वश्रष्ठ प्रक्रत आत्मविक्य मे घटाते हैं /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे कार्यज्ञ श्रीरामचन्द्रजी, आपसे भने यह पाषाणोपाख्यान कहा ।
पाषाणाख्यायिका से जो विज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, उससे यही आप निश्चय कीजिये कि सभी
सृष्टियाँ चिदाकाश में या शून्यता में ही स्थित हैं
सर्ग सन्दर्भ
पंचानबेवाँ सर्ग समाप्त छियानबेंवाँ सर्ग पाषाणोपाख्यान के तात्पर्य के रूप मेँ चिति का विवर्तरूप जगदभ्रम और अजर अमर चितिरूप आत्मा ही ब्रह्मानन्द है, यह वर्णन।