Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
भ्रमस्य चातिदृश्यत्वाददृश्यत्वान्महाचितेः ।
मदशक्तिवदात्मेति सत्यतास्यापि युज्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
योंब्रह्मरुप से सक सत्य होते हुए भी प्रतीयमान रपसे कैसे सव सत्य हुआ 2 क्योंकि रज्जुरुप
के सत्य होते हुए भी उसमे अध्यस्त ग्रॉप तो सत्य नहीं हैं, इस प्रश्न पर कहते हैं /
जगद्रूप भ्रम अत्यंत ही दृश्य है ओर उसका अधिष्ठान महाचैतन्य अदृश्य है । सारांश यह कि
रज्जुसर्पस्थल में रज्जु भी दृश्य है और साँप भी दृश्य है, दोनों दृश्य होने के कारण जब रज्जु का
दर्शन होता है, तब सर्प का बाध हो जाने के कारण सर्प की असत्यरूपता हो जाती है । जगद्भ्रम
में तो केवल जगद्भ्रान्ति देखी जाती है, परन्तु उसका अधिष्ठान ब्रह्म तो देखा नहीं जाता, अतः
रज्जुसर्प से यह जगत् विलक्षण है । जब यह वस्तुरिथति हुई, तब मदशक्ति के समान स्वयं अदृश्य
होकर दृश्यभ्रम का हेतु बनकर कार्यरूप से ही आत्मा अपनी सत्ता प्रकट करता है, अत: जगत् का
स्वरूप सत्य है, यह कथन युक्तिसंगत है