Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
असत्त्वाद्दृश्यविश्रान्तेरलभ्यत्वान्महाचितेः ।
उपलब्धुरभावाच्च शून्यनाम्नीव सत्यपि ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब पहले यह जो कहा ग्या ह कि ऐसी कर वस्तु हैं ही नहीं जो झूठी न हो, इस कवन की क्या
गति होगी 2 क्योकि ब्रह्म झूठ है नहीं; इस पर कहते हैं ।
भद्र, परमार्थ वस्तु में भी शून्यता-सा व्यवहार किया जा सकता है, क्योकि संसार काल
में सर्वदृश्यविश्रान्तिरूप मोक्ष प्राप्त रहता नहीं और उसके बिना अद्वितीय चिदात्मा की प्राप्ति
नहीं होती, इसी तरह मोक्षकाल में भी अन्तःकरणवाले प्रमाता जीव तथा उपलम्भक प्रमाण
आदि का बाध हो जाने से अभाव है, इसलिए आत्मा की एक तरह से अप्रसिद्धि-सी है, इसलिए
वैसा कहा गया है