Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रं पुरुषोऽकर्ता समेत्यव्यक्ततो जगत् ।
एवंदृष्टेः सत्यमेतदेवमर्थानुभूतितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
मोहरूप है, इसलिए सत्व आदि तीन गुणों की साम्य अवस्थारूप मूलकारण अव्यक्त से (प्रधान
से) प्रकृति से महतूतत्त्व आदि के क्रम से यह सारी सृष्टि हुई है । कपिलजी का यह मत भी
सत्य ही समझना चाहिए, क्योकि ब्रह्म सर्वशक्ति है, यह निर्विवाद है