Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
विवर्तो ब्रह्मणो दृश्यमित्येवंवादिनोऽपि सत् ।
मतमेवंस्वरूपाणामर्थानामनुभूतितः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कि वेदान्तियों
का मत है- यह सारा दृश्यवर्ग ब्रह्म का विवर्त है, वह भी सत् है । क्योकि उस तरह विमर्श
करने पर उसी तरह के समस्त पदार्थ अनुभूत होते हैं