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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

परमाणुसमूहात्म जगदित्यपि सत्यतः । संवेद्यते यथा यद्यत्तत्तथैवानुभूतितः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार कणाद. गोतमः, सोत्रान्तिक, वैभाषिक, जैन आदि के मतों में जो यह माना गया है कि सारा जगद्‌ परमाणुओं का समूह ही है, वह भी सत्य है, क्योकि वैसी उनकी कल्पना उनके अनुभव के अनुसार ठीक ही है, यह कहते हैं । जिन वादियों की कल्पना है कि यह जगत्‌ परमाणुओं का समूहरूप ही है और वही यथार्थरूप से अनुभूत होता है, वह भी सत्य है, क्योंकि उनको जिस-जिस पदार्थ के विषय में जैसा-जैसा अनुभव हुआ उस-उस अनुभव के अनुसार की गई उनकी कल्पना ठीक ही है