Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
विवरं शरणं येषां कीटानामिव भूतले ।
तेषामसुरबालानां विवेकेषु कथैव का ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
कीटों के सदृश भूतल के छेद ही जिनके
आवासस्थान हैं, उन असुररूपी बालकों के विवेक की तो कथा ही क्या यानी असुरों में तत्त्वज्ञान
का जनक विवेक होता है, यह कहना तो मूर्खता ही है