Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
नागजालमृणालानि मग्नानि धरणीतले ।
नगानामिव मूलानि जडानीव स्थितान्यलम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
उरी तह नायजाति में भी विवेक नहीं है, यह कहते हैं /
यह पाताललोक में जो नागों का जालरूप विसतन्तुओं का समूह डूबा हुआ है, वह भी वृक्षों के
मूल समूह के सदृश जड़ (विवेकहीन) ही हैं