Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
भृशं पिशाचाः पश्यन्ति भूतभोजनचिन्तया ।
धूमान्धकारानिलया ज्वालयाहुतयो यथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
पिशाच तो सदा भूख से ही तड़पते रहते हैं; उनको निरन्तर पेट भरने की विन्ता रहती हैं,
अतः कभी भी उनको विवेक नहीं हो सकता, यह कहते हैं /
जैसे अग्नि में गिरी आहुतियाँ अपने को निरन्तर धूम्र युक्त ज्वालाओं से जलती हुई ही देखती
हैं, वैसे ही प्राणियों को खा जाने की चिन्ता से, जो कि अज्ञानरूपी धूम्रान्धकार को वायु के सदृश
क्रोध, हिंसा आदि की ज्वालारूप बना देती है, अपने को जले हुए ही देखते हैं