Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
सर्वासां भूतजातीनां व्यग्राणां व्यर्थदीर्घया ।
क्षीबाणामिव गच्छन्ति दिवसानि दुरीहया ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
शराबियों के सदुश अतिव्यग्र सभी भूतजातियों के दिन निरर्थक
लम्बी-लम्बी दुष्ट इच्छाओं या चेष्टाओं से व्यतीत होते जाते हैं, विवेक का नाम भी वे किसी दिन
याद नहीं करते