Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
न कंचित्संस्पृशत्यन्तर्विवेको विमलो जनम् ।
जलेऽगाधे निपतितं निमज्जन्तं रजो यथा ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अगाध जल में डूब रहे पुरुष का धूलि स्पर्श नहीं करती, वैसे विषयों
में डूब रहे किसी पुरुष के भीतर निर्मल विवेक कभी स्पर्श नहीं करता