Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
नीयन्ते नियमाधूता मानवा मानवायुभिः ।
काम्पिकैः स्फुटतापूताः किरारुनिकरा इव ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
राघव, देह आदि में
होनेवाले अभिमान एक प्रकार से प्रबल वायु ही हैं, इन वायुओं के झकोरों से मनुष्य अक्रोध आदि
नियमों से चलित हो जाते हैं यानी क्रोध आदि शत्रुओं के अधीन हो जाते हैं । इसमें दृष्टान्त है
निःसार धान्य । जैसे सूप चलानेवाले किसानों के द्वारा धान्य को वायु ले जाते हैं, वैसे ही यहाँ
समझना चाहिए